केवलादेव में इन दिनों पक्षियों का कलरव, हलचल और अनोखी फूड चेन बना रही है मनोरम दृश्य
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, भरतपुर।
वरिष्ठ पक्षी विशेषज्ञ एवं पर्यावरणविद् दाऊ दयाल शर्मा की कलम से—
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में इन दिनों पानी के साथ जीवन भी लौट आया है। झीलों और जलभराव वाले क्षेत्रों में पक्षियों की चहचहाहट, कलरव और लगातार बनी रहने वाली हलचल एक ऐसा मनोरम दृश्य प्रस्तुत कर रही है, जिसे देखकर प्रकृति के अद्भुत संतुलन का सहज ही एहसास होता है।
हाल ही में आए पानी के बाद उद्यान के विभिन्न जल क्षेत्रों में अनेक प्रजातियों का प्रजनन चक्र सक्रिय हुआ है। कहीं छोटे-छोटे जलीय पक्षियों के बच्चे पानी में अठखेलियां करते दिखाई दे रहे हैं, तो दूसरी ओर बगुलों और पनकोवों के घोंसलों से निकले चूजों के लिए भोजन की आवश्यकता बढ़ गई है। प्रकृति ने भी जैसे इस आवश्यकता के अनुरूप अपनी ‘फूड चेन’ तैयार कर दी है।
इन दिनों छोटे, मध्यम और बड़े बगुलों के साथ छोटे एवं मध्यम आकार के पनकोवों की फीडिंग गतिविधियां विशेष रूप से आकर्षित कर रही हैं।
पनकोवा करता है ‘घेराबंदी’, बगुले करते हैं इंतजार
इस दृश्य का सबसे रोचक पक्ष इन दोनों पक्षी समूहों के बीच दिखाई देने वाला सामंजस्य है।
बगुला तैरकर मछलियों का पीछा नहीं कर सकता, जबकि पनकोवा पानी में कुशलतापूर्वक तैरकर और गोता लगाकर मछलियों का पीछा करता है। कई बार पनकोवों का समूह पानी के एक हिस्से से मछलियों को आगे की ओर खदेड़ता हुआ किनारे की तरफ ले आता है। किनारे पर बगुलों का समूह पहले से ही अपनी बारी का इंतजार करता दिखाई देता है।
जैसे ही मछलियां उथले पानी और किनारे की ओर आती हैं, बगुले उन्हें तेजी से पकड़ लेते हैं। इस तरह एक ही जल क्षेत्र में दो अलग-अलग पक्षी समूह अपनी-अपनी क्षमताओं के अनुरूप भोजन प्राप्त करते दिखाई देते हैं।
यह दृश्य केवल पक्षियों की भोजन तलाशने की गतिविधि नहीं है, बल्कि प्रकृति में मौजूद परस्पर सामंजस्य और अवसर का अद्भुत उदाहरण भी है।
एक के लिए मुश्किल, दूसरे के लिए अवसर
प्रकृति में हर जीव की अपनी विशेषता होती है। कोई पानी में गोता लगाने में माहिर है तो कोई उथले पानी और किनारे पर शिकार करने में। यही अलग-अलग क्षमताएं जब एक ही पारिस्थितिकी तंत्र में साथ आती हैं तो एक अद्भुत खाद्य-श्रृंखला का निर्माण होता है।
केवलादेव में इन दिनों दिखाई दे रहा यह दृश्य बताता है कि प्रकृति किसी एक जीव के लिए नहीं, बल्कि असंख्य जीवों के सह-अस्तित्व के लिए अपना तंत्र स्वयं संचालित करती है।
पानी आया तो जलीय जीव सक्रिय हुए, छोटी मछलियों और अन्य जीवों की संख्या बढ़ी, उन्हें खाने वाले पक्षी सक्रिय हुए और उनके बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था भी प्रकृति ने कर दी।
पर्यटकों के लिए बना आकर्षण का केंद्र
पानी में पनकोवों की सामूहिक हलचल, उनके पीछे आती मछलियां, किनारे पर इंतजार करते बगुले और आसपास उड़ते-उतरते दूसरे पक्षी—इन सबका सम्मिलित दृश्य इन दिनों केवलादेव आने वाले पर्यटकों और पक्षी प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
यह दृश्य हमें प्रकृति का एक सरल लेकिन गहरा संदेश भी देता है—
“जियो और जीने दो।”
यही भावना जब प्रकृति में बनी रहती है तो उसकी फूड चेन भी मजबूत होती है और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ रहता है।





Leave a Reply