वन्य जीव गणना… मई 2026

इस वर्ष देश में सिर्फ इंसानों की जनसंख्या की ही गणना हो रही हो, ऐसा नहीं है!  आपको संभवतः जानकारी न हो, प्रतिवर्ष  बुद्ध पूर्णिमा वाले दिन देश के अनेकानेक राष्ट्रीय उद्यानों में वन्य पशुओं की गणना भी की जाती है!
यह बताया जाता है कि व्यवस्थित रूप से वन्य जीवों की गणना 1970 में आरम्भ हुई और इसका श्रेय वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम को दिया जाना चाहिए जिसने इस गणना प्रक्रिया को कानूनी और वैज्ञानिक आधार दिया! 

मित्रों मुझे खुशी है कि वन्य जीव गणना का मेरा 45वां वर्ष है, मैंने पहली वन्य जीव गणना मे 1981-82 मे  भाग लिया था, तब से आज तक प्रतिवर्ष इस प्रक्रिया में सक्रिय भाग लेता रहा हूँ… इन 45 वर्षों में गणना पद्धति में अभूतपूर्व  बदलाव आया हैं!!

365 दिन मे यही 24 घंटे ऐसे होते हैं जिनमे आप जंगल के मिज़ाज को समझ रहे होते हैं… वन्य जीवो के साथ निशब्द संवाद कर रहे होते हैं… सूर्योदय की अरुणिमा मे चिड़ियों का कलरव,  मुग्ध करने वाला   जंगल का  मधुर संगीत… सूर्यास्त  की लालिमा, रात का मौन… आप हर लम्हे को जी रहे होते हैं… प्रकृति, वन्य जीव, पर्यावरण के साथ तारतम्य स्थापित कर रहे होते हैं…
इसी के बारे मे पढ़ें  मेरा धरातलीय आलेख …
प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी राजस्थान के  अभयारण्यों राष्ट्रीय उद्यान, वन विहार,  संरक्षित क्षेत्रों मे बुद्ध पूर्णिमा के दिन जल स्रोत वन्य जीव गणना ( annual water hole census of wildlife ) का आयोजन किया गया l
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान भरतपुर मे भी वन्य जीव गणना हुई जो कल एक मई को सांय पांच बजे से आज दो मई को पांच बजे तक चली.जल स्रोत वन्य जीव गणना पूर्णिमा की चांदनी रात मे  गणना टीमों का जल स्रोतों के पास छुप कर  बैठ के पानी पीने आने वाले वन्य जीवो  को गिना जाता है l यह गणना इस सिंद्धांत पर आधारित है कि कोई भी वन्य जीव चौबीस घंटे मे एक बार अवश्य पानी पीने आता है, इसके लिए उपलब्ध प्राकृतिक और कृत्रिम जल स्रोतों को चिन्हित कर ऐसे स्थान पर मचान, वॉच टॉवर, झोंपड़ी, झाड़ी  को चुना जाता है जहाँ से पूरा जल स्रोत गणक को दिखाई देता हो, किन्तु वन्य जीव को दिखाई नहीं दे ताकि वन्य जीव निश्चिन्त होकर पानी पिए l
वैसे वन्य जीवो कि गणना के लिए पग मार्क (foot print ), जल स्रोत गणना, कैमरा ट्रैप और  फेस मार्क  (  केवल बाघ, तेंदुआ, बघेरा, चीता  आदि के लिए ) जैसी पद्धति काम मे ली जाती हैं l इसमें जल स्रोत  पद्धति सरल, और ज्यादा प्रचलन मे है… यद्पि जल स्रोत गणना से प्राप्त आंकड़ों की पुष्टि कैमरा ट्रैप से भी की जाती है l
जल स्रोत गणना से प्राप्त आंकड़ों कि सटीकता निम्न तथ्यों पर निर्भर करती है…
जैसे पूर्णिमा को वर्षा हो जाना, गत वर्ष  मई 2025 मे पूर्णिमा कि रात अचानक वर्षा हो गई फलस्वरूप गणना को निरस्त कर अगले माह जून कि पूर्णिमा को  किया गया…
इसके आलावा पूर्णिमा से दो चार दिन पहले वर्षा हो जाना, जिससे जगह जगह गड्डों मे पानी भर जाता है और वन्य जीव मुख्य जल स्रोत पर  पानी न पीके गड्ढे मे ही पानी पीकर जंगल मे निकल जाता है और मुख्य गणना मे शामिल नहीं हो पाता…
तीसरा गणना क्षेत्र मे बहुत बड़े क्षेत्र मे काफ़ी पानी भरा होना, जिससे   गणना सटीकता से दूर हो जाती है l
इस बार प्रकृति मेहरबान रही, कल वर्षा भी नहीं हुई, एक सप्ताह पहले विशेष वर्षा नहीं हुई, और उद्यान मे पानी कि मात्रा भी बहुत अधिक नहीं है… उम्मीद है गणना के आंकड़े सटीक होंगे… क्योंकि इन आंकड़ों के आधार पर ही वन्य जीव संरक्षण कि भावी कार्ययोजना तैयार की जाती है l
आज से 45 वर्ष पूर्व की वन्यजीव गणना में टीमों को मिट्टी का कुंजा, भुने चने, सत्तू आदि दिया जाता था कई बार टीमें अपना खाना बना के घर से ले जाते थे, अच्छे दूरबीन, टेलीस्कोप, कैमरे उपलब्ध नहीं थे… ट्रैप कैमरा कोई जनता भी नहीं था….
अब उद्यान प्रशासन द्वारा गणना पॉइंट पर ही समय समय पर कैंपर ठंडा जल, गर्म चाय बिस्कुट, पैक थाली में गर्म सब्जी, दाल, चावल, सलाद, मिठाई, फ्रूटी, नाश्ता, रात 12 बजे चाय बिस्किट, टोर्च, ओडोमास, लू से बचने को प्याज़, नींबू, एलेक्ट्रोल पाउच, अच्छे दूरबीन, ट्रैप कैमरे उपलब्ध कराये जाते हैं… यही नहीं  सहायक वन संरक्षक भरत लाल जी के समन्वय में परमिन्दर सिंह क्षेत्रीय वन अधिकारी, मनोज शर्मा, पीतम सिंह फारेस्टर की टीम द्वारा सतत निगरानी और टीमों का सहयोग से गणना को सुगम,सटीक बनाया l
गणना में  वन विभाग स्टॉफ, वन मित्र, नेचुरलिस्ट, रिक्शा गाइड, पक्षी प्रेमी,  स्वयं सेवकों ने भाग लिया…
यही नहीं उद्यान के निदेशक  चेतन कुमार बी वी, आईएफएस  ने रात 12 बजे स्वयं हरेक टीम के पास जाकर गणना की प्रगति, गणकों के भोजन स्वास्थ्य का हाल लेकर अपनी प्रतिबद्धता तथा  भारी गर्मी में टीमों  का उत्साह वर्धन किया l
मेरे जैसे समर्पित पक्षीविद , पर्यावरणविद, प्रकृति प्रेमी के लिए ये गणना बहुप्रतिक्षित उत्सव है… जहाँ वर्ष में ये चौबीस घंटे के हरेक पल को जंगल में जियें l
गणना में स्वाम्प कैट (swamp cat ) भी दिखी जिसे रीड कैट या जंगल कैट भी कहते हैं जिसका साइंटिफिक नाम felis chaus  है l


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