लेखक: डी.डी. शर्मा (पक्षी विशेषज्ञ एवं पर्यावरणविद्)

पिछले चार दशकों से भरतपुर की मिट्टी और यहाँ की फिजाओं में गूँजती पक्षियों की चहचहाहट मेरा जीवन रही है। महीने के 25 दिन मैं केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की पगडंडियों पर बिताता हूँ। लेकिन आज जो मंजर मैं देख रहा हूँ, वह किसी त्रासदी से कम नहीं है। हाल ही में ‘दैनिक भास्कर’ की पड़ताल ने उस कड़वे सच को उजागर किया है जिसे मैं और मेरे साथी विशेषज्ञ सेवाराम माली जी लंबे समय से महसूस कर रहे थे।

संकट में केवलादेव: जहाँ सारस की संख्या 95% गिर गई

​कभी केवलादेव की पहचान यहाँ के भव्य ‘सारस’ हुआ करते थे। आज उनकी संख्या में 95% की भारी गिरावट आई है। इसका मुख्य कारण सिर्फ जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि हमारे अपने खेतों में बढ़ता कीटनाशकों का प्रयोग और सिमटती हुई झीलें हैं। पक्षी सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं हैं, वे हमारे ईकोसिस्टम की सेहत का पैमाना हैं। अगर वे घट रहे हैं, तो समझ लीजिए कि हमारा पर्यावरण बीमार है।

विकास या विनाश? वेटलैंड पर बसती कॉलोनियाँ

​सबसे दुखद पहलू यह है कि प्रशासन जिसे ‘विकास’ का नाम दे रहा है, वह वास्तव में प्रकृति का ‘विनाश’ है। भरतपुर में सेक्टर 13 स्कीम का एक हिस्सा सीधा उस वेटलैंड पर है जहाँ सर्दियों में साइबेरिया, सेंट्रल एशिया और यूरोप से करीब 700 दुर्लभ पक्षी आते हैं।

​”जब हम वेटलैंड के 700 मीटर अंदर तक सड़कें बना देते हैं, तो हम सिर्फ कंक्रीट नहीं बिछा रहे, हम उन बेजुबान मेहमानों के उतरने की जगह छीन रहे हैं जो हजारों मील का सफर तय कर यहाँ आते हैं।”

सिर्फ भरतपुर नहीं, पूरा राजस्थान खतरे में है

​हमारी पड़ताल में केवल भरतपुर ही नहीं, बल्कि राजस्थान के अन्य रत्न भी संकट में मिले:

  • सांभर झील: जहाँ 2,000 से अधिक अवैध बोरिंग के तार पक्षियों के लिए ‘फांसी के फंदे’ बन गए हैं।
  • अजमेर की आनासागर: जो 20 नालों के प्रदूषण से दम तोड़ रही है।
  • आबू की नक्की झील: जहाँ बफर जोन के नियमों को ताक पर रखकर होटल खड़े कर दिए गए हैं।

मेरा आह्वान: अब नहीं जागे तो कब?

​एक ‘बर्डिंग कोच’ के रूप में मेरा काम सिर्फ पक्षी दिखाना नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। यदि प्राधिकरण यह कहता है कि उन्हें ‘वेटलैंड होने की सूचना नहीं है’, तो यह हमारी व्यवस्था की बहुत बड़ी चूक है।

​मैं सरकार और नागरिकों से अपील करता हूँ:

  1. वेटलैंड अथॉरिटी के रिकॉर्ड को जमीनी स्तर पर सख्ती से लागू किया जाए।
  2. ​अवैध निर्माण और बोरिंग पर तुरंत रोक लगे।
  3. ​विकास की योजनाओं में पर्यावरण विशेषज्ञों की राय को प्राथमिकता दी जाए।

ये पक्षी हमारी विरासत हैं। अगर इनका घर उजड़ गया, तो हमारी आने वाली पीढ़ियां इन्हें सिर्फ किताबों और पुरानी तस्वीरों में ही देख पाएंगे।


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